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संपूर्ण विश्व में अपना साम्राज्य स्थापित करने वाले अंग्रेजों को आखिर क्यों भारत में एक मिट्टी के दुर्ग के आगे घुटने टेकने पड़े।
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नमस्कार दोस्तों आपका स्वागत है आपके अपने ब्लॉग रीड मी भारत में,तो मेरे प्यारे दोस्तों आज के इस ब्लॉग के अंदर हम चर्चा करेंगे भारत के एक ऐसे दुर्ग की जिसे आज तक कोई भी शत्रु सेना जीत नहीं सकी एक ऐसा दुर्ग जिसपर मुगलों मराठों तथा अंग्रेजों द्वारा अनेकों बार आक्रमण किए गए लेकिन इस दुर्ग को जीत नहीं पाए तो चलिए चलते है और जानते है कि आखिर यह कौनसा दुर्ग था ।
लोहागढ़ दुर्ग
भरतपुर स्थित लोहागढ़ का अजेय दुर्गलोहागढ़ का दुर्ग राजस्थान के भरतपुर जिले में स्थित है इस दुर्ग का निर्माण जाटों का अफलातून कहे जाने वाले जाट शासक महाराजा सूरजमल ने करवाया था। महाराजा सूरजमल एक महान योद्धा होने के साथ साथ महान कूटनीतिज्ञ तथा रणनीतिज्ञ भी थे उन्होंने अपनी दूरदर्शी सोच एवं बुद्धिमानी के बल पर एक ऐसे अभेद्य दुर्ग का निर्माण करवाया था जो इतिहास में एक अजेय दुर्ग के नाम से जाना गया यह एक ऐसा दुर्ग था जिसने मुगलों तथा अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिए थे संपूर्ण विश्व में अपना साम्राज्य स्थापित करने वाले अंग्रेजों एवम् उनकी सेना ने भरतपुर में आके घुटने टेक दिए । अंग्रेजों द्वारा लार्ड लेक के नेतृत्व में दुर्ग पर 17 बार आक्रमण किया गया लेकिन हर बार उन्हें विफलता ही हाथ लगी जिससे अंग्रेजों की सेना हताश हो गई तथा घुटने टेकने पर मजबूर हो गई।
क्या कारण थे कि अंग्रेज भी लोहागढ़ दुर्ग को कभी जीत नहीं पाए
लोहागढ़ दुर्ग पर मुगलों तथा अंग्रेजों के द्वारा अनेकों बार आक्रमण किए जो दुर्ग को तोड़ने में विफल साबित हुए जिसका मुख्य कारण था दुर्ग की निर्माण कला तथा बनावट,दुर्ग के चारों ओर मिट्टी की एक मोटी तथा विशाल दीवार थी जिसमें तोप के गोले धंसकर रह जाते एवं ठंडे पड़ जाते थे जिसकी वजह से तोपों के हमले निरर्थक हो गए थे इसके अलावा यदि शत्रु सैनिक दीवार पर चढ़ने की कोशिश करते तो दुर्ग की दीवार से खौलता हुआ तेल डाला जाता था जिससे शत्रु सैनिक झुलसकर मर जाते थे इसके बाद भी जो शत्रु सैनिक दुर्ग की दीवार पर चढ़ने में कामयाब हो जाते उन्हें जाट सेना के द्वारा मौत के घाट उतरा दिया जाता था.यही कारण था कि अंग्रेजों द्वारा लार्ड लेक के नेतृत्व में 17 बार हमला किए जाने के बाद भी वे इस दुर्ग को नहीं जीत पाए।

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